सोमवार व्रत कथा का रोचक प्रसंग, जाने शिव का ये चमत्कार

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हिंदू धर्म में सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव अत्यंत भोले हैं और उन्हें प्रसन्न करने के लिए भव्य पूजन की आवश्यकता नहीं होती। सच्ची श्रद्धा और मन से की गई एक क्षणिक भक्ति ही उन्हें खुश कर देती है। विशेषकर सावन के महीने में सोमवार व्रत (Somvar Vrat) का विशेष महत्व होता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सोमवार व्रत कथा को पढ़ने और सुनने का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि बिना कथा के व्रत अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं उस पौराणिक कथा के बारे में, जो भक्तों के लिए आस्था का प्रतीक बनी हुई है। संतान प्राप्ति की चाहत और शिव की अनूठी कृपा कथा के अनुसार, किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके पास अपार धन-दौलत थी, लेकिन संतान के अभाव में वह हमेशा दुखी रहता था। संतान प्राप्ति के लिए उसने प्रत्येक सोमवार को व्रत रखना शुरू कर दिया और पूरी श्रद्धा से शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने लगा।  साहूकार की लगन और भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती प्रसन्न हो गईं और उन्होंने भगवान शिव से साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का निवेदन किया। शिव...

पंचांग का महत्वपूर्ण अंग तिथि क्या है?

 सत्य ऋषि

हिन्दू काल गणना के अनुसार मास में 30 तिथियाँ होतीं हैं, जो दो पक्षों में बंटीं होती हैं। चन्द्र मास एक अमावस्या के अन्त से शुरू होकर दूसरे अमावस्या के अन्त तक रहता है।  अमावस्या के दिन सूर्य और चन्द्र का भौगांश बराबर होता है। इन दोनों ग्रहों के भोंगाश में अन्तर का बढ़ना ही तिथि को जन्म देता है। 



तिथि की गणना कैसे की जाती है?

तिथि = चन्द्र का भोगांश-सूर्य का भोगांश / (Divide) 12.

शुक्ल पक्ष में 1-14 और पूर्णिमा

कृष्ण पक्ष में 1-14 और अमावस्या

वैदिक लोग वेदांग ज्योतिष के आधार पर तिथि को अखण्ड मानते हैं। क्षीण चन्द्रकला जब बढने लगता है तब अहोरात्रात्मक तिथि मानते हैं। जिस दिन चन्द्रकला क्षीण होता उस दिन अमावास्या माना जाता है। 

उसके दूसरे दिन शुक्ल प्रतिपदा होती है। एक सूर्योदय से अपर सूर्योदय तक का समय जिसे वेदाें में अहोरात्र कहा गया है उसी को एक तिथि माना जाता है। प्रतिपदा तिथि को 1, इसी क्रमसे 2,3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14 और 15 से पूर्णिमा जाना जाता है। 

कृष्ण पक्ष कब शुरू होता है ?

इसी तरह पूर्णिमा के दूसरे दिन कृष्ण पक्ष का प्रारम्भ होता है और उसको कृष्ण प्रतिपदा (1) माना जाता है। 

इसी क्रम से 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13, 14 इसी दिन चन्द्रकला क्षीण हो तो कृष्ण चतुर्दशी टुटा हुआ मान कर उसी दिन अमावास्या मानकर दर्शश्राद्ध किया जाता है और 15वें दिन चन्द्रकला क्षीण हो तो विना तिथि टुटा हुआ पक्ष समाप्त होता है। 

वैदिक पंचांग क्या है?

नेपाल में वेदांग ज्योतिष के आधार पर "वैदिक तिथिपत्रम्" (वैदिक पंचांग) व्यवहार में लाया गया है। सूर्य सिद्धान्त के आधार के पंचांगाें की तिथियां दिन में किसी भी समय आरम्भ हो सकती हैं और इनकी अवधि उन्नीस से छब्बीस घण्टे तक हो सकती है।

ये 1-15 तक तिथियों को निम्न नाम से कहते हैं:- 

मूल नाम तद्भव नाम

पूर्णिमा पूरनमासी

प्रतिपदा पड़वा

द्वितीया दूज

तृतीया तीज

चतुर्थी चौथ

पंचमी पंचमी

षष्ठी        छठ

सप्तमी सातें

अष्टमी आठें

नवमी नौमी

दशमी दसमी

एकादशी ग्यारस

द्वादशी बारस

त्रयोदशी तेरस

चतुर्दशी चौदस

अमावस्या अमावस

किस आधार पर तय होते हैं त्योहार?

हमारे पर्व-त्योहार हिन्दी तिथियों के अनुसार ही होते हैं, इसके पीछे एक विशेष कारण है। पर्व-त्योहारों में किसी विशेष देवता की पूजा की जाती है। 

अतः स्वाभाविक है कि वे जिस तिथि के अधिपति हों, उसी तिथि में उनकी पूजा हो। यही कारण है कि उस विशेष तिथि को ही उस विशिष्ट देवता की पूजा की जाए। 

तिथियों का स्वामी किसे कहते हैं?

प्रतिपदा- अग्नयादि देवों का उत्थान पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को होता है। अग्नि से संबंधित कुछ और विशेष पर्व प्रतिपदा को ही होते हैं।

द्वितीया- प्रजापति का व्रत प्रजापति द्वितीया इसी तिथि को होता है। तृतीया- चूँकि गौरी इसकी स्वामिनी है, अतः उनका सबसे महत्वपूर्ण व्रत हरितालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को ही महिलाएँ करती हैं।

चतुर्थी का स्वामी कौन?

चतुर्थी-गणेश या विनायक चतुर्थी सर्वत्र विख्यात है। यह इसलिए चतुर्थी को ही होती है, क्योंकि चतुर्थी के देवता गणेश हैं। पंचमी- पंचमी के देवता नाग हैं, अतः श्रावण में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की दोनों पन्चमी को नागों तथा मनसा (नागों की माता) की पूजा होती है।

षष्ठी- स्वामी कार्तिक की पूजा षष्ठी को होती है। सप्तमी- देश-विदेश में मनाया जाने वाला सर्वप्रिय त्योहार प्रतिहार षष्ठी व्रत (डालाछठ) यद्यपि षष्ठी और स्वामी दोनों दिन मनाया जाता है, किंतु इसकी प्रधान पूजा (और उदयकालीन सूर्यार्घदान) सप्तमी में ही किया जाता है। 

छठ पर्व का निर्णय कैसे होता है?

छठ पर्व के निर्णय में सप्तमी प्रधान होती है और षष्ठी गौण। यहाँ ज्ञातव्य है कि सप्तमी के देवता सूर्य हैं।

वस्तुतः सायंकालीन अर्घ्य में हम सूर्य के तेजपुंज (सविता) की आराधना करते हैं, जिन्हें 'छठमाई' के नाम से संबोधित करके उन्हें प्रातःकालीन अर्घ्य ग्रहण करने के लिए निमंत्रित किया जाता है, जिसे ग्रामीण अंचलों में 'न्योतन' कहा जाता है, पुनः प्रातःकालीन सूर्य को 'दीनानाथ' से संबोधित किया जाता है।

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