Origin of Almanac: धार्मिक क्रियाओं के समय निश्चित करने के लिए हुई पंचांग की उत्पत्ति
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सत्य ऋषि
Origin of Almanac: देश दुनिया के सभी पंचांगों की उत्पत्ति प्राचीन काल में धार्मिक क्रियाओं के समय निश्चित करने के लिए हुई है। बाद में उनमें सामाजिक उत्सव और वर्तमान काल में राजकीय महत्व के कार्यक्रम भी शामिल किए गए। हमारे समस्त प्राचीन सामाजिक उत्सवों को भी धार्मिक स्वरूप दिया गया है।
भारत में कई शताब्दियों से विविध धर्म प्रचलित हैं। इससे हमारे पंचांग भी विविध प्रकार के बने हैं। इनके मुख्य प्रकार (1) हिंदू, (2) इस्लाम, (3) पारसी और (4) खिष्टीय है। आज के हिंदू पंचांगों के भी करीब 30 प्रकार पाए जाते हैं।
हिंदू पंचांगों के अतिरिक्त अन्य (इस्लामी आदि) पंचांगों में गणित का विषय बहुत कम आता है। इससे हमारी अधिकतर चर्चा हिंदू पंचांगों के विषय में ही होगी। अत: इस लेख में, जहां अन्यथा न कहा गया हो, वहां "पंचांग" शब्द से हिंदू पंचांग ही समझना चाहिए।
गणित की सूक्ष्मता
हमारे पंचांगों में उत्सवों और व्रतों के अतिरिक्त ग्रहण, सूर्योदयास्त, इष्ट घटनाओं के समय, आकाश में ग्रहों की स्थिति आदि खगोलीय विषय दिए जाते हैं। खगोलशास्त्र आजकल पश्चिम में इतनी उन्नत स्थिति में आ गया है कि वहां के पंचांगों में खगोलीय घटनाओं के समय आकाश स्थित ग्रहों की प्रत्यक्ष घटनाओं के साथ सेकंड तक बराबर मिल जाते हैं।
हमारे पंचांगों का गणित इतना स्थूल हो गया है कि उनके ग्रहणों में डेढ़ घंटे तक का अंतर पाया जाता है। इसका कारण यह है कि जिन ग्रंथों से हमारे पंचांग बनते हैं, वे कम से कम 500 वर्ष पुराने हैं। इन 500 वर्षों में पश्चिम में गणित ज्योतिष में बहुत उन्नति हो गई है। इससे हमारे पंचांगों का गणित अर्बाचीन गणित ज्योतिष शास्त्र से करना चाहिए। ताकि वह यथार्थ उतरे।
ऐसे गणित को "प्रत्यक्ष" या "इक्तुल्य" गणित या "दृग्गणित" कहते हैं। आज गुजरात और महाराष्ट्र में समस्त पंचांग प्रत्यक्ष गणित से बनाए जाते हैं। पर भारत के अन्यान्य प्रदेशों में प्रत्यक्ष गणित से बहुत कम पंचांग बनाए जाते हैं।
ग्रहों की स्थिति
केवल प्रत्यक्ष गणित से हमारे पंचांगों का प्रश्न हल नहीं हो सकता। हमारे पंचांग सूर्यचंद्र की आकाशीय स्थिति के अनुसार बनाए जाते हैं और इनमें अन्य ग्रहों की स्थिति भी दी रहती है। स्थिति बतलाने की रीति यह है कि आकाश की एक निश्चित रेखा के ऊपर एक निश्चित बिंदु से ग्रहों के अंतर नापे जाते हैं। और ये अंतर पंचांगों में दिए जाते हैं।
उस निश्चित रेखा को "क्रांतिवृत्त", निश्चित बिंदु को "आरंभस्थान" और वहां से ग्रह के अंतर को "भोग" कहते हैं। पाश्चात्यों का आरंभ स्थान निश्चित है। और वह वसंतसंपात है। मगर हमारे पंचांग का आरंभ स्थान कौन सा बिंदु हो, इस विषय में हमारे पंडितों में बहुत मतभेद है।
वसंतसंपात और हमारे आरंभ स्थान के बीच में जो अंतर है, उसको "अयनांश" कहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अयनांश कितना है, इस विषय में हमारे पंडितों में मतभेद है। अयनांश के निश्चय के बिना आरंभ स्थान का निश्चय नहीं होता। और आरंभ स्थान के निश्चय के बिना पंचांग बन नहीं सकता। अत: अयनांश हमारे पंचांग की महत्वपूर्ण समस्या है।
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